PrayerCount कहाँ से आया
PrayerCount की शुरुआत 90 के दशक के एक बच्चे से हुई, जो रोज़ प्रार्थना करते हुए बड़ा हुआ।
स्कूल से पहले, परीक्षा से पहले, सोने से पहले। हाथ जोड़कर कुछ मिनट, कमरे के कोने में एक दीया, और माता-पिता व दादा-दादी से सीखे शब्द, उनका अर्थ समझ आने से बहुत पहले।
ज़िंदगी व्यस्त होती गई। फ़ोन आए, फिर काम, फिर बाकी सब। लेकिन आदत बनी रही, और वही शांत काम करती रही जो हमेशा करती थी: रोज़मर्रा की ज़िंदगी से एक पल निकालना।
चिंतन का एक पल। जो है उसमें संतोष का एक पल।
बरसों में एक बात साफ़ हो गई। प्रार्थना किसी एक धर्म की नहीं है। लोग मंदिरों और गुरुद्वारों में, देरासरों और गिरजाघरों में, मस्जिदों और मठों में, नदी किनारे और रसोई की अलमारी के पास प्रार्थना करते हैं। वे मनकों से, गीतों से, मौन से प्रार्थना करते हैं। शब्द बदलते हैं। चाह नहीं बदलती।
हम कोई भी नाम लें, हम अपने से परे किसी चीज़ तक पहुँचना चाहते हैं। इस जीवन से परे, इस संसार से परे, स्वयं ब्रह्मांड से परे। प्रार्थना ही वह तरीका है जिससे हम उससे जुड़े रहते हैं।
PrayerCount इसका सम्मान करने का एक छोटा तरीका है। यह गिनती रखता है, ताकि आप प्रार्थना में बने रहें।